गुरुवार, 19 मार्च 2009

मुखौटे.....विवेक रंजन श्रीवास्तव

मुखौटे

बचपन में
मेरे खिलौनों में शामिल थी एक रूसी गुड़िया
जिसके भीतर से निकल आती थी
एक के अंदर एक समाई हुई
हमशकल एक और गुड़िया
बस थोड़ी सी छोटी आकार में !

सातवीं
सबसे छोटी गुड़िया भी बिलकुल वैसी ही
जैसे बौनी हो गई हो
पहली सबसे बड़ी वाली गुड़िया
सब के सब एक से मुखौटौ में !

बचपन में माँ को और अब पत्नी को
जब भी देखता हूँ
प्याज छीलते हुये या
काटते हुये पत्ता गोभी
परत दर परत , मुखौटों सी हमशकल
बरबस ही मुझे याद आ जाती है
अपनी उस रूसी गुड़िया की !
बचपन जीवन भर याद रहता है !

मेरे बगीचे में प्रायः दिखता है
एक गिरगिटान
हर बार एक अलग पौधे पर ,
कभी मिट्टी तो कभी सूखे पत्तों पर
बिलकुल उस रंग के चेहरे में
जहाँ वह होता है
मानो लगा रखा हो उसने
अपने ही चेहरे का मुखौटा
हर बार एक अलग रँग का !

मेरा बेटा
लगा लेता है कभी कभी
रबर का कोई मास्क
और डराता है हमें ,या
हँसाता है कभी
जोकर का मुखौटा लगा कर !

मैँ जब कभी
शीशे के सामने
खड़े होकर
खुद को देखता हूँ तो
सोचता हूँ अपने ही बारे में
बिना कोई आकार बदले
मास्क लगाये
या रंग बदले ही
मैं नजर आता हूँ खुद को
अनगिन आकारों ,रंगो, में
अवसर के अनुरूप
कितने मुखौटे
लगा रखे हैं मैने !

विवेक रंजन श्रीवास्तव

3 टिप्‍पणियां:

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सुन्दर! हर समय के अनुकूल एक मुखौटा होता है हमारे पास आवश्यकतानुसार निकाल कर लगा लेते हैं।
घुघूती बासूती

ktheLeo ने कहा…

बचपन की बात आई है,
अच्छा कहा है,Read me also at:
www.sachmein.blogspot.com

Arvind Mishra ने कहा…

ये जो दिख रहा है वह तो असली हैं ना विवेक जी ! बढियां कविता !