सोमवार, 29 सितंबर 2008

गाँधी जंयती पर ईद है इस बार ....

बादलों की ओढ़नी थोड़ा हटाकर
चाँद ने सबसे कहा कल ईद है
पैगाम है यह आसमां से धरती सुने
अंत हो आतंक का , हल ईद है
ईद मुबारक ............विवेक रंजन श्रीवास्तव

शनिवार, 27 सितंबर 2008

देवी गीत ...निशुल्क

देवी गीत ...
नव रात्री पर्व सारे देश में नौ दस दिनों तक देवी पूजन , भक्तिभाव पूर्ण गायन , उपवास , बड़े बड़े पंडालों की स्थापना , और गरबा के आयोजन कर मनाया जाता है . देवी गीतों का प्रचार सब तरफ बढ़ गया है . पावन पर्व में गीत संगीत से पवित्र भअवना का प्रादुर्भाव और प्रसार बड़ा सुखद व मन भावन होता है . इसी दृष्टि से हर वर्ष नवरात्रि से पहले नये नये देवीगीत , जस , नौराता , के कैसेट्स बाजार में आ जाते हैं . दूर दूर गाँव ,शहरों में उत्सव समितियां ये कैसेट्स अनवरत बजाकर एक भाव भक्ति का वातावरण बना देती हैं . अब तो नवरात्रि के अनुकूल एस एम एस , रिंगटोन , वालपेपर आदि की भी मार्केटिंग हो रही है . बाजार की इस बेहिसाब माँग के चलते अनेक सस्तुआ शब्दों हल्के मनोरंजन वाले विकृत मानसिकता के देवी गीत भी विगत में सुनने को मिले . इनसे मन कोपीड़ा होती है , यह सांस्कृतिक पराभव ठीक नहीं है .
सुरुचिपूर्ण भक्ति , व देवी उपासना के लिये गीत संगीत ऐसा होना चाहिये जो श्रद्धा , विश्वास, सद्भाव , समर्पण तथा भक्ति को बढ़ावा दे .
इसी उद्देश्य से मैंने कुछ भावपूर्ण , सुन्दर , व सार्थक शब्दमय देवी गीतों की रचना की है . जो भी गायक , सी.डी. निर्माता , भक्त , धार्मिक संस्थायें चाहे वे इन सोद्देश्य गीतों को मुझसे निशुल्क जनहित में प्राप्त कर उन्हें प्चारित करने हेतु कैसेट , सीडी बनवा सकते हैं . चाहें तो संपर्क करें .
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध"
C / 6 ,विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
मो. ०९४२५४८४४५२
Email vivek1959@yahoo.co.in

सोमवार, 22 सितंबर 2008

देश सेवा में मन है तो उसके लिये



नेताओं से....................
by ..Prof.C.B.Shrivastava
C/6 , MPSEB Colony , Rampur ,JABALPUR (MP
mob. 09229118812)
देश सेवा परम उच्च आदर्श है
लोगों ने जानें तक दी हैं इसके लिये।
सोचिये आज क्या कर रहे आप हैं
यह उठापटक है सारी किसके लिये ?
देश सेवा में मन है तो उसके लिये
किसी कुर्सी या पद की जरूरत नहीं।
सैकड़ों काम दुनियॉं में सेवा के हैं
जो करें कुछ तो जीवन में फुरसत नहीं ।।
सिर्फ संकल्प के सिवा कुछ भी नहीं
सेवा करने को केवल लगन चाहिये।
अपने मन से भला पूछिये तो जरा
हैं ये कसरत-कवायत भला किसलिये ? ।।1।।
आज इस दल में है, कल किसी और में,
फिर किसी और में फिर किसी और में।
शांति मन की गंवा यों भटक क्यों रहे
भला हासिल क्या यों मन की झकझोर में ।।
है दलों में विचारों की जो भिन्नता
तो चुनावों में कुर्सी का कठजोड़ क्यो ?
देष भी है वहीं और जनता वहीं
लक्ष्य सेवा है तो दलबदल किसलिये ? ।।2।।
व्रत है सेवा का जो, धन का क्यों मोह तो,
क्यों ये सारे हवाले-घोटाले हुये ?
खेले जाते हैं क्यों, कुर्सी के वास्ते
पर्दे के पीछे आवागमन के जुये ?
मोह से जागिये, स्वार्थ को त्यागिये
खुदको भी धोखा देना मुनासिब नहीं
जीतना सारी जनता का मन है उचित
अपनी छबि साफ सुथरी रखें इसलिए ।।3।।

प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव `विदग्ध´

शनिवार, 13 सितंबर 2008

अंजान से

मेरी भाषा
विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र"
सी ६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर, जबलपुर म.प्र.
मेरी भाषा
हिन्दी नही है
अंग्रेजी या तमिल भी नही .
मेरी भाषा है
पालने में झूलती किलकारियाँ
चिड़ियों की चहचहाहट
झरनों का कलकल नाद
बादलों की ओट से
सूरज की ताँक झाँक .
मेरी भाषा है
मौन की
नेह की भाषा
स्पर्श की
चैन की भाषा
आखों की
मुस्कान की भाषा
ईमान की
इंसान की भाषा
ना त्रिभाषा ....
बस एक ही भाषा
अंजान से
पहचान की भाषा

वो सचमुच अपनी है

हिन्दी
विवेक रंजन श्रीवास्तव
c/6 , mpseb colony
Rampur , Jabalpur

संस्कृत की बेटी जो
भारत की भाषा है
अद्भुत जो बिरली जो
सचमुच जो संस्कृति है
हिन्दी वो अपनी है
लिपि जिसकी सुन्दर है
सरल और सीधी है
अक्षर जो वाक्य जो
शब्द जो दे संदेश
हिन्दी वो अपनी है
वाणी जो मीठी है
मधुर और स्मित है
ऐसी जो मनभावन
वो सचमुच अपनी है
हिन्दी जो सबकी है
हिन्दी जो तेरी है
हिन्दी जो मेरी है
इसकी है उसकी है
सचमुच जो सबकी है
हिन्दी वो अपनी है
एकता का सूत्र है जो
सरस्वती वरदान है
संपदा हैं शब्द जिसके
व्याकरण सम्मान्य है
हिन्दी वो महान है ...

vivek ranjan shrivastava
09425484452

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

हिन्दी दिवस पर.............

हिन्दी और हिन्दी दिवस
प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध"
सी.६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
कहते सब हिन्दी है बिन्दी भारत के भाल की
सरल राष्ट्र भाषा है अपने भारत देश विशाल की
किन्तु खेद है अब तक दिखती नासमझी सरकार की
हिन्दी है आकांक्षी अब भी संवैधानिक अधिकार की !!
सिंहासन पर पदारूढ़ है पर फिर भी वनवास है
महारानी के राजमहल में दासी का वास है
हिन्दी रानी पर प्रशासनिक अंग्रेजी का राज है
हिन्दी के सिर जो चाहिये वह अंग्रेजी के ताज है
इससे नई पीढ़ी में दिखता अंग्रेजी का शोर है
शिक्षण का माध्यम बन बैठी अंग्रेजी सब ओर है
अंग्रेजी का अपने ढ़ंग का ऐसा हुआ पसारा है
बिन सोचे समझे लोगो ने सहज उसे स्वीकारा है
सरल नियम है शासन करता जिसका भी सम्मान है
हर समाज में स्वतः उसी का होने लगता मान है
ग्रामीणों की बोली तक में अब उसकी घुसपैठ है
बाजारों , व्यवहारों में, हर घर में, उसकी ऐठ है
हिन्दी वाक्यों में भी हावी अंग्रेजी के शब्द हैं
जबकि समानार्थी उन सबके हिन्दी में उपलब्ध हैं
गलत सलत बोली जाती अंग्रेजी झूठी शान से
जो बिगाड़ती है संस्कृति को भाषा के सम्मान को
साठ साल की आयु अपनी हिन्दी ने यूँ ही काटी है
हिन्दी दिवस मुझे तो लगता अब केवल परिपाटी है
कल स्वरूप होगा हिन्दी का प्रखर समझ में आता है
अंग्रेजी का भारत के बस दो ही प्रतिशत से नाता है
हिन्दी का विस्तार हो रहा भारी आज विदेशों में
जो बोली औ॔ समझी जाती सभी सही परिवेशों में
बढ़ती जाती रुचि दुनियाँ की हिन्दी के सम्मान में
किन्तु उचित व्यवहार न देखा जाता हिन्दुस्तान में
अच्छा हो शासन समाज समझे अपने व्यवहार को
ना समझी से नष्ट करे न भारतीय संस्कार को
हिन्दी निश्चित अपने ही बल आगे बढ़ती जायेगी
भारत भर की नहीं विश्व की शुभ बिन्दी बन जायेगी
Prof. C. B. Shrivastava "vidagdha"

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

द्वार पर सत्कार का , इजहार रंगोली


रंगोली

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सी ६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
vivek1959@yahoo.co.in

द्वार पर सत्कार का , इजहार रंगोली
उत्सवी माहौल का , अभिसार रंगोली

खुशियाँ हुलास और , हाथो का हुनर हैं
मन का है प्रतिबिम्ब , श्रंगार रंगोली

धरती पे उतारी है , आसमान से रंगत
है आसुरी वृत्ति का , प्रतिकार रंगोली

लड़कियों ने घर की , हिल मिल है सजाई
रौनक है मुस्कान है , मंगल है रंगोली

पूजा परंपरा प्रार्थना , जयकार प्रभु की
शुभ लाभ की है कामना , त्यौहार रंगोली

संस्कृति का है दर्पण , सद्भाव की प्रतीक
कण कण उजास है , संस्कार रंगोली

बिन्दु बिन्दु मिल बने , रेखाओ से चित्र
पुष्पों से कभी रंगों से अभिव्यक्त रंगोली


विवेक रंजन श्रीवास्तव

चौखानों में अखबार के ,कल छपी ऐसी पहेली



पहेली
विवेक रंजन श्रीवास्तव
सी ६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
मो. ०९४२५४८४४५२
ई मेल vivek1959@yahoo.co.in
blog http://vivekkikavitaye.blogspot.com
पहले अण्डा हुआ या हुई मुर्गी है पहेली
उत्तर कुछ भी दो उत्तर खुद है एक पहेली
कई गुरुओ ने हैं ढ़ूँढ़े जिंदगी भर हल मगर
जिंदगी फिर भी है , अनसुलझी सी पहेली
शब्द फिर कम पड़ गये,स्मृति के भण्डार के
चौखानों में अखबार के ,कल छपी ऐसी पहेली
हर शख्स है देता जबाब अपने ही अंदाज में
हल कई जिसके सही हैं जिंदगी ऐसी पहेली
डोर है उलझी हुई , पतंग है परवान पर
ढ़ील देनी है जरूरी छोर माँजे का पहेली
मासूम हैं वो या कि है, ये उनकी अदा
मासूमियत उनकी बनी है कैसी पहेली



......................vivek ranjan shrivastava

बुधवार, 23 जुलाई 2008

बदल डालो उसे , बह रही हवा जो .................

बदल डालो उसे , बह रही हवा जो .................

प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध"
विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
मो. ०९४२५४८४४५२

देश ने तो तरक्की बहुत की मगर , देश निष्ठा हुई आज बीमार है
बोलबाला है अपराध का हर जगह , जहाँ देखो वहीं कुछ अनाचार है


नीति नियमों को हैं भूल बैठे सभी , मूलतः जिनके हाथों में अधिकार हैं
नहीं जनहित का जिनको कोई ख्याल है , ऐसे लोगों की ही भरमार है
सोच उथला है , धनलाभ की वृत्ति है , दृष्टि ओछी , नहीं दूरदर्शी नयन
कुर्सियाँ लोभ के हैं भँवर जाल में , दूर उनसे बहुत अब सदाचार है

नियम और कायदे सिर्फ कहने को हैं , हर दुखी दर्द सहने को लाचार है
योजनायें अनेकों हैं कल्याण हित , किंतु जनता का बहुधा तिरस्कार है
सारे आदर्श तप त्याग गुम हो गये , बढ़ गया बेतरह अनीतिकरण
दलालों का चलन है , सही काम कोई चाह के भी न कर पाती सरकार है

देश कल कारखानों से बनते नही , देश बनते हैं श्रम और सदाचार से
देश के नागरिको की प्रतिष्ठा , चलन , समझ श्रम , गुण तथा उनके आचार से
है जरूरी कि अनुभव से लें सीख सब , सुधारे आचरण और वातावरण
सचाई , न्याय ,कर्तव्य की लें शरण , देश से अपने जो तनिक प्यार है

बदलने होंगे व्यवहार सबको हमें , अपने सुख के लिये देश हित के लिये
जहाँ भी है आज तक अंधेरा घना , जलाने होंगे उन झोपड़ियों में दिये
देश में आज जो सब तरफ हो रहा देख उसको जरूरी है नव जागरण
क्योंकि जो पीढ़ियाँ आने वाली हैं कल उनको भी सुख से जीने का अधिकार है

जो सरल शांत सच्चे हैं वे लुट रहे , सब लुटेरों के हाथो में व्यापार है
देश हित जिन शहीदों ने दी जान थी क्या यही उनकी श्रद्धा का उपहार है ?
है कसम देश की सब उठो बंधुओं ! बदल डालो उसे बह रही जो हवा
बढ़े नैतिक पतन हित हरेक नागरिक और नेता बराबर गुनहगार है .


प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध"
विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

बुधवार, 16 जुलाई 2008

कुछ गीत

गुम गये

विवेकरंजन श्रीवास्तव

रामपुर, जबलपुर



दीवाने धर्म के, मय धर्म गुम गये,
मानस भी गुम गई, कुरान गुम गये ।

गुजरात में हुआ जो, बुरा बहुत हुआ,
दुष्मन तलाषते रहे, दोस्त गुम गये ।

साजिष थी, जुनून था या था जिहाद,
लगा पता है पर, कई पते ही गुम गये ।

हमको भी हवा ने कुछ इस तरह छला,
हम भीड़ हो गये, इंसान गुम गये ।

जुनूनियों की जिद का असर, बच्चों पे यों हुआ,
कुछ यतीम हो गये, और कुछ गुम गये ।

बस्तियाॅं बेषक बसा लोगे फिर से,
लाओगे कहाॅं से, जो रिष्ते गुम गये ।

शब्दों ने अक्षरों ने, भाषा ही बदल ली,
भाव सो गये और गीत गुम गये ।















नई आकृति बदल बनें ।
विवेकरंजन श्रीवास्तव

रामपुर, जबलपुर
काला आखर भेंैस बराबर,
बहुत बोझ रद्दी ढ़ोई।
पढ लिख कर अब बनें साक्षर,
सद्ग्रंथो की रहल बनें ।

अर्थहीन अक्षर एकाकी,
भाव शून्य वे व्यर्थ रहें,
टाओ साथी हाथ बढ़ायें
साथ सार्थक गजल बनें ।

दाग बद्नुमा पिछड़ेपपन का
सबको मिल धोना होगा,
कीचड़ में जन्म कमल पाता
कर्म करें और सफल बनें ।

पाठ जिदंगी पढा रही है,
साथ तुम्हारे शासन है,
लाभ उठायें योजनाओं का
आरक्षण का सुफल बनें ।

दीन, हीन, अस्पृष्य, दलित
लाचार नहीं वो
अपने पैरो होयें खड़े
सब समर्थ सबल बनें ।

पथ दर्षक बाबू जगजीवन,
भीमराव और ज्योतिफुले,
गुरू घासी, रैदास, धाय पन्ना,
आदर्ष हमारे विमल बनेें ।

पीछे पीछे चलते आये
कई सदियों से,
अगुवाई का समय आज है,
अपने हाथों भाग्य सवारें, पहल बनें ।

अपनी खुद जगह बनायें
छोड़ कालिमा धवल बनें,
छोड़े बाना बौना कद लम्बा कर लें,
नये रूप में नई आकृति बदल बनें ।

इस बार होली में
विवेकरंजन श्रीवास्तव
रामपुर, जबलपुर
रंगो में सराबोर इस कदर हुये,
इस बार होली में ।

अपने ही घर में बाहर रहे खड़े,
इस बार होली में ।

जल के राख हो, नफरत की होलिका,

आल्हाद का प्रहलाद बचे, इस बार होली में ।

हो न फिर फसाद, मजहब के नाम पर,

केसर में, हरा रंग मिले, इस बार होली में ।

बाकी न रहे अरमान, रंग इस तरह मलो,

छेड़ो रंगो में फाग, इस बार होली में ।

ठस रंग में रंगी सेना, अच्छी न लगे अब,

खूनी न हों अंदाज, इस बार होली में ।

















झंडा ऊॅंचा रहे हमारा
विवेकरंजन श्रीवास्तव
रामपुर, जबलपुर
जन गण की धुन पर इतराता,
सौ करोड़ मन, तन ने धारा,

गूंज रहा बस इक जयकारा,
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............

राजनीति रंगो की करते,
भावनाओ से खेल रहे जो,
जनता ने उनको ललकारा,
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............

कोई कतर कर इसकी पट्टियाॅं,
बना रहा संकीर्ण झंड़ियाॅं,
सजा उन्हें देगा जन सारा,
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............

प्रत्युत्तर में करे प्रतिक्रिया,
मन उनके भी साफ नहीं हैं,
सत्ता का गंदा गलियारा,
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............

झंड़ा, उनकी नहीं बपौती,
झंड़ा है अब एक चुनौती,
जन जन ने है आज पुकारा
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............

झंड़ा मिला विरासत हमको,
सदा रहा है, सदा रहेगा,
नभ में जैसे हो ध्रुव तारा
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............










उनकी गजल है ।
विवेकरंजन श्रीवास्तव

रामपुर, जबलपुर
नुपुर का नर्तन, उनकी गजल है ।

तबले की सरगम, उनकी गजल है ।।

सितारों की धड़कन, हैं हाथ उनके ।

रागों का जादू, उनकी गजल है ।।

रंगो की रौनक, चितेरा सबेरा ।

पनघट की गोरी, उनकी गजल है ।।

भावो की सरिता, गुंजन स्वरों का ।

शब्दों की बंदिष, उनकी गजल है ।।

कहानी का मंचन, हमारी पहल है ।

परदे पे नाटक, उनकी गजल है ।।

वोटो का सौदा, कुर्सी का हिस्सा ।

संसद में प्रहसन, कैसी गजल है ।।

विकटों की बारिष, चैको का टोटा ।

किस्मत क्रिकेट की, रूॅंआसी गजल है ।।


(

रविवार, 18 मई 2008

जयपुर बम विस्फोट पर


जयपुर बम विस्फोट पर

प्रो सी बी श्रीवास्तव
सी ६ विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर जबलपुर

बह चुका आंसानियत का खून कई बाजार में
कोसते हैं लोग सब अब तुम्हें इस संसार में
सिरफिरों ! आतंकवादी ! आदमियत के दुश्मनों
आदमियत को भी तो समझो लौट फिर इंसा बनो

निरपराधों की निरर्थक ले रहे तुम जान क्यों
नासमझदारी पै अपनी है तुम्हें अभिमान क्यों
आये दिन चाहे जहाँ पर लगाते तुम आग हो
जला के रख देगी वह ही तुम्हारे ही बाग को

खून का औ आग का ये खेल है अच्छा नहीं
तुम्हारा ये जुनुं कल कर सकेगा रक्षा नहीं
आदमी हो ये नहीं है आदमी का आचरण
कुत्तों सा होता है जग में दुष्टों का जीवन मरण

जाति के भाषा के या फिर धर्म के उन्माद में
जो भी उलझे जग को उनने ही किया बरबाद है
किये तो विस्फोट इतने पर तुम्हें है क्या मिला
बद्दुआयें लेने सबकी कब रुकेगा सिलसिला

मिटा के औरों के घर परिवार उनकी जिंदगी
कर रहे हो तुम समझते हो खुदा की बन्दगी
तो ये जानो हर तरह से ये तुम्हारी भूल है
बोता जो जैसा वही मिलता उसे ये उसूल है

कुछ न हासिल होगा खुद के किये पै पछताओगे
कमाने को पुण्य निकले पाप में मिट जाओगे
राख हो जाओगे जलकर जुल्म की इस राह में
गलाने की शक्ति होती त्रस्त की हर आह में

जहाँ जन्में पले विकसे और सब कुछ पा रहे
उसी अपने देश और समाज को क्यों खा रहे
सही सोच विचार अब भी दिला सकता यश बड़ा
ज्योंकि अब्दुल हमीद को सम्मान पदक सुयश जड़ा




प्रो सी बी श्रीवास्तव

ये मन ध्यान प्रभु का भुलाने न पाये

ये मन ध्यान प्रभु का भुलाने न पाये

प्रो सी बी श्रीवास्तव
सी ६ विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर जबलपुर

ये मन ध्यान प्रभु का भुलाने न पाये ।
शिथिलता कहीं कोई आने न पाये ।।

बड़ी ही प्रबल हैं विषय वासनायें
सदा अपने चंगुल में मन को फसाँये ।
वही बच सके जो रहे साफ निश्छल
औ प्रभु की कृपा से गये जो बचाये ।।१।।

यहाँ मोहमाया ने सबको भुलाया
न कोई समय पर कभी काम आया ।
हरेक रास्ते में है धोखे हजारों
सदा कर्म अपने ही बस काम आये ।।२।।

है दुनियाँ पुरानी मगर अजनबी है
कभी कुछ है लेकिन अलग कुछ कभी है ।
बदलती रही सदा ये अपनी चालें
करेगी ये कल फिर कोई क्या बताये ?३।।

है बस अपना खुद का औ प्रभु का सहारा
न ऐसा कोई जो कभी न हो हारा .।
थके हारे मन को मिली चेतना नई
तभी जब भी भगवान ने पथ दिखाये ।।४।।

सदा ध्यान से शुध्दता मन ने पाई
यही शुध्दता ही है सच्ची कमाई ।
सदा ज्योति बन आये भगवान आगे
कि निष्पाप मन से गये जब बुलाये ।।५।।

शुक्रवार, 9 मई 2008

प्रार्थना

प्रार्थना
प्रो सी॑ बी श्रीवास्तव विदग्ध
C-6 , M.P.S.E.B. Colony Rampur ,
Jabalpur (M.P.) 482008
मोबा ०९४२५४८४४५२



हे दीनबन्धु दयालु प्रभु तुम विश्व के आधार हो
तुम बिन्दु में हो सिन्धु , अणु में अपरिमित विस्तार हो ।

तुम चेतना , आलोक , ऊर्जा , गति अलख पावन परम्
तम में फँसे , माया भ्रमित , अल्पज्ञ , सीमित नाथ हम ।
निर्बल , समय की धार में असहाय बहते जा रहे
तुम कर कृपा दे हाथ अपना नाथ हमें उबार लो ।।१।। हे दीन...

आनन्द , सत् चित् , शाँत , शुभ , सत्यं , शिवं , तुम सुन्दरम्
अपने बुने ही जाल में भूले , फँसे , उलझे हैं हम
सब चाहकर भी रात दिन भ़म से सुलझ पाते नही
इस आर्त मन की दुख भरी प्रभु प्रार्थना स्वीकार हो ।।२।। हे दीन...

मिलता नही सुख चैन मन को कहीं भी संसार में
तृष्णा का माया मृग लुभाता मन को हर व्यवहार में ।
नल से निकल जल सी बही सी जा रही है जिन्दगी
इसको सहेज , सँवारने को देव अपना प्यार दो।।३।। हे दीन...

हम शब्दों के बुनकर हैं

हम शब्दों के बुनकर हैं

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सी॑ - 6 एम.पी.ई.बी.कालोनी
रामपुर, जबलपुर ४८२००८

मोबा. ०९४२५४८४४५२
ई मेल vivekranjan.vinamra@gmail.com

देवी हो तुम अक्षर की माँ ,
हम शब्दों के बुनकर हैं !
भाव प्रसून गूँथ भाषा में ,
गीत लाये हम चुनकर हैं !!

भाव भंगिमा और तालियाँ,
दर्शक कवि के दर्पण हैं !
सृजन सफल जब हों आल्हादित
श्रोता रचना सुनकर हैं !!

हम पहचाने नीर क्षीर को ,
सबको इतनी बुद्धि दो !
विनत कामना करते हैं माँ ,
भाव शब्द से गुरुतर हो !!

बहुत प्रगति कर डाली हमने
आजादी के बरसों में !
और बढ़े आबादी पर माँ ,
धरती भी तो बृहतर हो !!

हम सब सीधे सादे वोटर ,
वो आश्वासन के बाजीगर !
पायें सब के सब मंत्रीपद,
पर कोई तो "वर्कर" हो !!

राग द्वेष छल बढ़ता जाता
धर्म दिखावा बनता जाता !
रथ पर चढ़ जो घूम रहे हैं ,
कोई तो पैगम्बर हो !!

घर में घुस आतंकी बैठे ,
खुद घर वाले सहमे सहमे !
चुन चुन कर के उनको मारे
ऐसा कोई रहबर हो !!

शिलान्यास तो बहुत हो रहे
प्रस्तर पट सब पड़े अधूरे ,
आवंटन को दिशा मिले अब
काम कोई तो जमकर हो!!

कागज कलम और कविता से
मन वीणा स्पंदित कर के !
युग की दिशा बदलकर रख दे
कवि ऐसा जादूगर हो !!

अँत करो माँ अंधकार का
जन गण के मन में प्रकाश दो !
नव युग के इस नव विहान में
बच्चा बच्चा "दिनकर" हो !!


विवेक रंजन श्रीवास्तव

गुरुवार, 3 जनवरी 2008

सिर्फ बातें व्यर्थ हैं कुछ काम होना चाहिये

सिर्फ बातें व्यर्थ हैं कुछ काम होना चाहिये

प्रो. सी.बी.श्रीवास्तव
सेवा निवृत प्राध्यापक
वर्तमान पता
c-6, mpseb colony, rampur Jabalpur ,पिन ४८२००८
फोन ०७६१ २७०२०८१
मोबा. ९४२५४८४४५२ email vivek1959@yahoo.co.in





सिर्फ बातें व्यर्थ हैं कुछ काम होना चाहिये
हर हृदय की शांति सुख आराम होना चाहिये

बातें तो होती बहुत पर काम हो पाते हैं कम
बातों में विश्वास कअ पेगअम होना चाहिये

उड़ती बातों औ॔ दिखावों से भला क्या फायदा
कअम हों जिनके सुखद परिणाम होनअ चाहिये

हवा के झोंकों से आके सोच यदि जावे बिखर
तो सजाने कअ उन्हें व्यायाम होना चाहिये

लोगों की नजरों में बसते स्वप्न हैं समृद्धि के
पाने नई उपलब्धि नित संग्राम होना चाहिये

पारदर्शी यत्न ऐसे हों जिन्हें सब देख लें
सफलता जो मिले उसका नाम होना चाहिये

सकारात्मक भावना भरती है हर मन में खुशी
सबके मन का आनन्द सुख का धाम होना चाहिये

आसुरी दुष्वृत्तियों के सामयिक उच्छेद को
साथ शाश्वत सजग तत्पर राम होना चाहिये !!