शनिवार, 11 दिसंबर 2010

वाचस्पति जी की फरमाइश पर , लिखने बैठा था कविता ,गजल बन गई है लगता, लिखता क्या कविता पर कविता

मजा आ गया ... सुबह पोस्ट डालकर टूर पर निकल गया था अभी लौटकर ब्लाग देखा , कविता करने के लिये विषय मिला है कविता .. बस लिख डाला है कुछ ..बताइये कैसी लगी रचना ?कैसा लगा यह नव प्रयोग ?

कविता

विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र "

कोमल हृदय तरंगो की , सरगम होती है कविता
शीर्षक के शब्दो को देती , अर्थ सदा पूरी कविता

सजल नयन और तरल हृदय ,परपीड़ा से हो जाता है
हम सब में ही छिपा कवि है ,बता रही हमको कविता

छंद बद्ध हो या स्वच्छंद हो , अभिव्यक्ति का साधन है
मन के भावो का शब्दो में , सीधा चित्रण है कविता

कोई दृश्य , जिसे देखकर ,भी न देख सब पाते हैं
कवि मन को उद्वेलित करता , तब पैदा होती कविता

कवि की उस पीड़ा का मंथन , शब्द चित्र बन जाता है
दृश्य वही देखा अनदेखा , हमको दिखलाती कविता

लेख, कहानी, व्यंग विधायें, लिखने के हथियार बहुत
कम शब्दो में गाते गाते , बात बड़ी कहती कविता

वाचस्पति जी की फरमाइश पर , लिखने बैठा था कविता
गजल बन गई है लगता, लिखता क्या कविता पर कविता

मासूम जी ! मासूमियत ही , कवियो की जागीर है
बम के धमाको,आतंक के माहौल में,शांति संदेशा है कविता

3 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

छंद बद्ध हो या स्वच्छंद हो , अभिव्यक्ति का साधन है
मन के भावो का शब्दो में , सीधा चित्रण है कविता

कोई दृश्य , जिसे देखकर ,भी न देख सब पाते हैं
कवि मन को उद्वेलित करता , तब पैदा होती कविता

अविनाश जी की पसंद पर शानदार गजल बन गई है ... आभार

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

आपने कविता पर कविता लिख कर कविता को गजल कर दिया। अमन के पैगाम को अमर कर दिया।
अविनाश मूर्ख है

GirishMukul ने कहा…

अहा आहा न वाह वाह