शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

हिन्दी दिवस पर.............

हिन्दी और हिन्दी दिवस
प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध"
सी.६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
कहते सब हिन्दी है बिन्दी भारत के भाल की
सरल राष्ट्र भाषा है अपने भारत देश विशाल की
किन्तु खेद है अब तक दिखती नासमझी सरकार की
हिन्दी है आकांक्षी अब भी संवैधानिक अधिकार की !!
सिंहासन पर पदारूढ़ है पर फिर भी वनवास है
महारानी के राजमहल में दासी का वास है
हिन्दी रानी पर प्रशासनिक अंग्रेजी का राज है
हिन्दी के सिर जो चाहिये वह अंग्रेजी के ताज है
इससे नई पीढ़ी में दिखता अंग्रेजी का शोर है
शिक्षण का माध्यम बन बैठी अंग्रेजी सब ओर है
अंग्रेजी का अपने ढ़ंग का ऐसा हुआ पसारा है
बिन सोचे समझे लोगो ने सहज उसे स्वीकारा है
सरल नियम है शासन करता जिसका भी सम्मान है
हर समाज में स्वतः उसी का होने लगता मान है
ग्रामीणों की बोली तक में अब उसकी घुसपैठ है
बाजारों , व्यवहारों में, हर घर में, उसकी ऐठ है
हिन्दी वाक्यों में भी हावी अंग्रेजी के शब्द हैं
जबकि समानार्थी उन सबके हिन्दी में उपलब्ध हैं
गलत सलत बोली जाती अंग्रेजी झूठी शान से
जो बिगाड़ती है संस्कृति को भाषा के सम्मान को
साठ साल की आयु अपनी हिन्दी ने यूँ ही काटी है
हिन्दी दिवस मुझे तो लगता अब केवल परिपाटी है
कल स्वरूप होगा हिन्दी का प्रखर समझ में आता है
अंग्रेजी का भारत के बस दो ही प्रतिशत से नाता है
हिन्दी का विस्तार हो रहा भारी आज विदेशों में
जो बोली औ॔ समझी जाती सभी सही परिवेशों में
बढ़ती जाती रुचि दुनियाँ की हिन्दी के सम्मान में
किन्तु उचित व्यवहार न देखा जाता हिन्दुस्तान में
अच्छा हो शासन समाज समझे अपने व्यवहार को
ना समझी से नष्ट करे न भारतीय संस्कार को
हिन्दी निश्चित अपने ही बल आगे बढ़ती जायेगी
भारत भर की नहीं विश्व की शुभ बिन्दी बन जायेगी
Prof. C. B. Shrivastava "vidagdha"

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

द्वार पर सत्कार का , इजहार रंगोली


रंगोली

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सी ६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
vivek1959@yahoo.co.in

द्वार पर सत्कार का , इजहार रंगोली
उत्सवी माहौल का , अभिसार रंगोली

खुशियाँ हुलास और , हाथो का हुनर हैं
मन का है प्रतिबिम्ब , श्रंगार रंगोली

धरती पे उतारी है , आसमान से रंगत
है आसुरी वृत्ति का , प्रतिकार रंगोली

लड़कियों ने घर की , हिल मिल है सजाई
रौनक है मुस्कान है , मंगल है रंगोली

पूजा परंपरा प्रार्थना , जयकार प्रभु की
शुभ लाभ की है कामना , त्यौहार रंगोली

संस्कृति का है दर्पण , सद्भाव की प्रतीक
कण कण उजास है , संस्कार रंगोली

बिन्दु बिन्दु मिल बने , रेखाओ से चित्र
पुष्पों से कभी रंगों से अभिव्यक्त रंगोली


विवेक रंजन श्रीवास्तव

चौखानों में अखबार के ,कल छपी ऐसी पहेली



पहेली
विवेक रंजन श्रीवास्तव
सी ६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
मो. ०९४२५४८४४५२
ई मेल vivek1959@yahoo.co.in
blog http://vivekkikavitaye.blogspot.com
पहले अण्डा हुआ या हुई मुर्गी है पहेली
उत्तर कुछ भी दो उत्तर खुद है एक पहेली
कई गुरुओ ने हैं ढ़ूँढ़े जिंदगी भर हल मगर
जिंदगी फिर भी है , अनसुलझी सी पहेली
शब्द फिर कम पड़ गये,स्मृति के भण्डार के
चौखानों में अखबार के ,कल छपी ऐसी पहेली
हर शख्स है देता जबाब अपने ही अंदाज में
हल कई जिसके सही हैं जिंदगी ऐसी पहेली
डोर है उलझी हुई , पतंग है परवान पर
ढ़ील देनी है जरूरी छोर माँजे का पहेली
मासूम हैं वो या कि है, ये उनकी अदा
मासूमियत उनकी बनी है कैसी पहेली



......................vivek ranjan shrivastava

सोमवार, 25 अगस्त 2008

बुधवार, 23 जुलाई 2008

बदल डालो उसे , बह रही हवा जो .................

बदल डालो उसे , बह रही हवा जो .................

प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध"
विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
मो. ०९४२५४८४४५२

देश ने तो तरक्की बहुत की मगर , देश निष्ठा हुई आज बीमार है
बोलबाला है अपराध का हर जगह , जहाँ देखो वहीं कुछ अनाचार है


नीति नियमों को हैं भूल बैठे सभी , मूलतः जिनके हाथों में अधिकार हैं
नहीं जनहित का जिनको कोई ख्याल है , ऐसे लोगों की ही भरमार है
सोच उथला है , धनलाभ की वृत्ति है , दृष्टि ओछी , नहीं दूरदर्शी नयन
कुर्सियाँ लोभ के हैं भँवर जाल में , दूर उनसे बहुत अब सदाचार है

नियम और कायदे सिर्फ कहने को हैं , हर दुखी दर्द सहने को लाचार है
योजनायें अनेकों हैं कल्याण हित , किंतु जनता का बहुधा तिरस्कार है
सारे आदर्श तप त्याग गुम हो गये , बढ़ गया बेतरह अनीतिकरण
दलालों का चलन है , सही काम कोई चाह के भी न कर पाती सरकार है

देश कल कारखानों से बनते नही , देश बनते हैं श्रम और सदाचार से
देश के नागरिको की प्रतिष्ठा , चलन , समझ श्रम , गुण तथा उनके आचार से
है जरूरी कि अनुभव से लें सीख सब , सुधारे आचरण और वातावरण
सचाई , न्याय ,कर्तव्य की लें शरण , देश से अपने जो तनिक प्यार है

बदलने होंगे व्यवहार सबको हमें , अपने सुख के लिये देश हित के लिये
जहाँ भी है आज तक अंधेरा घना , जलाने होंगे उन झोपड़ियों में दिये
देश में आज जो सब तरफ हो रहा देख उसको जरूरी है नव जागरण
क्योंकि जो पीढ़ियाँ आने वाली हैं कल उनको भी सुख से जीने का अधिकार है

जो सरल शांत सच्चे हैं वे लुट रहे , सब लुटेरों के हाथो में व्यापार है
देश हित जिन शहीदों ने दी जान थी क्या यही उनकी श्रद्धा का उपहार है ?
है कसम देश की सब उठो बंधुओं ! बदल डालो उसे बह रही जो हवा
बढ़े नैतिक पतन हित हरेक नागरिक और नेता बराबर गुनहगार है .


प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध"
विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

बुधवार, 16 जुलाई 2008

कुछ गीत

गुम गये

विवेकरंजन श्रीवास्तव

रामपुर, जबलपुर



दीवाने धर्म के, मय धर्म गुम गये,
मानस भी गुम गई, कुरान गुम गये ।

गुजरात में हुआ जो, बुरा बहुत हुआ,
दुष्मन तलाषते रहे, दोस्त गुम गये ।

साजिष थी, जुनून था या था जिहाद,
लगा पता है पर, कई पते ही गुम गये ।

हमको भी हवा ने कुछ इस तरह छला,
हम भीड़ हो गये, इंसान गुम गये ।

जुनूनियों की जिद का असर, बच्चों पे यों हुआ,
कुछ यतीम हो गये, और कुछ गुम गये ।

बस्तियाॅं बेषक बसा लोगे फिर से,
लाओगे कहाॅं से, जो रिष्ते गुम गये ।

शब्दों ने अक्षरों ने, भाषा ही बदल ली,
भाव सो गये और गीत गुम गये ।















नई आकृति बदल बनें ।
विवेकरंजन श्रीवास्तव

रामपुर, जबलपुर
काला आखर भेंैस बराबर,
बहुत बोझ रद्दी ढ़ोई।
पढ लिख कर अब बनें साक्षर,
सद्ग्रंथो की रहल बनें ।

अर्थहीन अक्षर एकाकी,
भाव शून्य वे व्यर्थ रहें,
टाओ साथी हाथ बढ़ायें
साथ सार्थक गजल बनें ।

दाग बद्नुमा पिछड़ेपपन का
सबको मिल धोना होगा,
कीचड़ में जन्म कमल पाता
कर्म करें और सफल बनें ।

पाठ जिदंगी पढा रही है,
साथ तुम्हारे शासन है,
लाभ उठायें योजनाओं का
आरक्षण का सुफल बनें ।

दीन, हीन, अस्पृष्य, दलित
लाचार नहीं वो
अपने पैरो होयें खड़े
सब समर्थ सबल बनें ।

पथ दर्षक बाबू जगजीवन,
भीमराव और ज्योतिफुले,
गुरू घासी, रैदास, धाय पन्ना,
आदर्ष हमारे विमल बनेें ।

पीछे पीछे चलते आये
कई सदियों से,
अगुवाई का समय आज है,
अपने हाथों भाग्य सवारें, पहल बनें ।

अपनी खुद जगह बनायें
छोड़ कालिमा धवल बनें,
छोड़े बाना बौना कद लम्बा कर लें,
नये रूप में नई आकृति बदल बनें ।

इस बार होली में
विवेकरंजन श्रीवास्तव
रामपुर, जबलपुर
रंगो में सराबोर इस कदर हुये,
इस बार होली में ।

अपने ही घर में बाहर रहे खड़े,
इस बार होली में ।

जल के राख हो, नफरत की होलिका,

आल्हाद का प्रहलाद बचे, इस बार होली में ।

हो न फिर फसाद, मजहब के नाम पर,

केसर में, हरा रंग मिले, इस बार होली में ।

बाकी न रहे अरमान, रंग इस तरह मलो,

छेड़ो रंगो में फाग, इस बार होली में ।

ठस रंग में रंगी सेना, अच्छी न लगे अब,

खूनी न हों अंदाज, इस बार होली में ।

















झंडा ऊॅंचा रहे हमारा
विवेकरंजन श्रीवास्तव
रामपुर, जबलपुर
जन गण की धुन पर इतराता,
सौ करोड़ मन, तन ने धारा,

गूंज रहा बस इक जयकारा,
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............

राजनीति रंगो की करते,
भावनाओ से खेल रहे जो,
जनता ने उनको ललकारा,
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............

कोई कतर कर इसकी पट्टियाॅं,
बना रहा संकीर्ण झंड़ियाॅं,
सजा उन्हें देगा जन सारा,
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............

प्रत्युत्तर में करे प्रतिक्रिया,
मन उनके भी साफ नहीं हैं,
सत्ता का गंदा गलियारा,
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............

झंड़ा, उनकी नहीं बपौती,
झंड़ा है अब एक चुनौती,
जन जन ने है आज पुकारा
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............

झंड़ा मिला विरासत हमको,
सदा रहा है, सदा रहेगा,
नभ में जैसे हो ध्रुव तारा
झंड़ा ऊॅंचा रहे हमारा.............










उनकी गजल है ।
विवेकरंजन श्रीवास्तव

रामपुर, जबलपुर
नुपुर का नर्तन, उनकी गजल है ।

तबले की सरगम, उनकी गजल है ।।

सितारों की धड़कन, हैं हाथ उनके ।

रागों का जादू, उनकी गजल है ।।

रंगो की रौनक, चितेरा सबेरा ।

पनघट की गोरी, उनकी गजल है ।।

भावो की सरिता, गुंजन स्वरों का ।

शब्दों की बंदिष, उनकी गजल है ।।

कहानी का मंचन, हमारी पहल है ।

परदे पे नाटक, उनकी गजल है ।।

वोटो का सौदा, कुर्सी का हिस्सा ।

संसद में प्रहसन, कैसी गजल है ।।

विकटों की बारिष, चैको का टोटा ।

किस्मत क्रिकेट की, रूॅंआसी गजल है ।।


(

रविवार, 18 मई 2008

जयपुर बम विस्फोट पर


जयपुर बम विस्फोट पर

प्रो सी बी श्रीवास्तव
सी ६ विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर जबलपुर

बह चुका आंसानियत का खून कई बाजार में
कोसते हैं लोग सब अब तुम्हें इस संसार में
सिरफिरों ! आतंकवादी ! आदमियत के दुश्मनों
आदमियत को भी तो समझो लौट फिर इंसा बनो

निरपराधों की निरर्थक ले रहे तुम जान क्यों
नासमझदारी पै अपनी है तुम्हें अभिमान क्यों
आये दिन चाहे जहाँ पर लगाते तुम आग हो
जला के रख देगी वह ही तुम्हारे ही बाग को

खून का औ आग का ये खेल है अच्छा नहीं
तुम्हारा ये जुनुं कल कर सकेगा रक्षा नहीं
आदमी हो ये नहीं है आदमी का आचरण
कुत्तों सा होता है जग में दुष्टों का जीवन मरण

जाति के भाषा के या फिर धर्म के उन्माद में
जो भी उलझे जग को उनने ही किया बरबाद है
किये तो विस्फोट इतने पर तुम्हें है क्या मिला
बद्दुआयें लेने सबकी कब रुकेगा सिलसिला

मिटा के औरों के घर परिवार उनकी जिंदगी
कर रहे हो तुम समझते हो खुदा की बन्दगी
तो ये जानो हर तरह से ये तुम्हारी भूल है
बोता जो जैसा वही मिलता उसे ये उसूल है

कुछ न हासिल होगा खुद के किये पै पछताओगे
कमाने को पुण्य निकले पाप में मिट जाओगे
राख हो जाओगे जलकर जुल्म की इस राह में
गलाने की शक्ति होती त्रस्त की हर आह में

जहाँ जन्में पले विकसे और सब कुछ पा रहे
उसी अपने देश और समाज को क्यों खा रहे
सही सोच विचार अब भी दिला सकता यश बड़ा
ज्योंकि अब्दुल हमीद को सम्मान पदक सुयश जड़ा




प्रो सी बी श्रीवास्तव