चौबीस घंटे
एलेक्सा, गूगल
सब सुन रहे हैं,
हमारी बातें।
मोबाइल सब ट्रेस कर रहा है,
कहां , कब गए ,
कितनी देर रुके.
फायर अलार्म सूंघ रहा है
हर पल हमारी सांसे,
हवा की ठंडक।
जाने किन किन
कैमरों की निगाहों में
होते हैं हम
क्रेडिट या डेबिट कार्ड
को सब पता होता है
कहां क्या कितना
किस पर खर्च
कर रहे हैं हम
हजारों आभासी मित्रों
के बीच ।
फिर भी संदेह, एक मात्र अंक शायी जीवन साथी पर भी
सच कितने अकेले हैं
सब
अपने वितान में ।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
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