मंगलवार, 20 जुलाई 2010

बरसात की बात

बरसात की बात


विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर , जबलपुर


लो हम फिर आ गये
बरसात की बात करने ,पावस गोष्ठी में
जैसे किसी महिला पत्रिका का
वर्षा विशेषांक हों , बुक स्टाल पर
ये और बात है कि
बरसात सी बरसात ही नही आई है
अब तक
बादल बरसे तो हैं , पर वैसे ही
जैसे बिजली आती है गांवो में
जब तब

हर बार
जब जब
घटायें छाती है
मेरा बेटा खुशियां मनाता है
मेरा अंतस भी भीग जाता है
और मेरा मन होता है एक नया गीत लिखने का
मौसम के इस बदलते मिजाज से
हमारी बरसात से जुड़ी खुशियां बहुगुणित हो
किश्त दर किश्त मिल रही हैं हमें
क्योकि बरसात वैसे ही बार बार प्रारंभ होने को ही हो रही है
जैसे हमें एरियर
मिल रहा है ६० किश्तों में

मुझे लगता है
अब किसान भी
नही करते
बरसात का इंतजार उस व्यग्र तन्मयता से
क्योंकि अब वे सींचतें है खेत , पंप से
और बढ़ा लेते हैं लौकी
आक्सीटोन के इंजेक्शन से

देश हमारा बहुत विशाल है
कहीं बाढ़ ,तो कहीं बरसात बिन
हाल बेहाल हैं
जो भी हो
पर
अब भी
पहली बरसात से
भीगी मिट्टी की सोंधी गंध,
प्रेमी मन में बरसात से उमड़ा हुलास
और झरनो का कलकल नाद
उतना ही प्राकृतिक और शाश्वत है
जितना कालिदास के मेघदूत की रचना के समय था
और इसलिये तय है कि अगले बरस फिर
होगी पावस गोष्ठी
और हम फिर बैठेंगे
इसी तरह
नई रचनाओ के साथ .

गुरुवार, 4 मार्च 2010

बच्चो के सपनो में,परियों की दुआ दीजिये

बच्चो के सपनो में,परियों की दुआ दीजिये

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर
जबलपुर

बच्चो के सपनो में,परियों की दुआ दीजिये
नींद चैन की मेरे बच्चों की लौटा दीजिये

प्यार का पाठ पढ़ना , यदि अपराध हो
तो सबसे पहले हमको ही सजा दीजिये
नहा आये हैं ,पहने हैं कपड़े झक सफेद
गुलाल प्यार का थोड़ा सा लगा दीजिए

रोशनी की किरण खुद ही चली आयेगी
छेद छोटा सा छत में , बस करा दीजिये
फैला रहा है मुस्कराकर, खुश्बू हवाओ में
इस फूल के पौधे चार, और लगा दीजिये

न बनें नक्सलवादी , न कोई आत्मघाती
इंसानी नस्ल में ,आदमी ही रहने दीजिये

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

हर सुबह सो रहे हैं, रतजगा हो रहा है,

हर सुबह सो रहे हैं, रतजगा हो रहा है,

विवेकरंजन श्रीवास्तव

मो.नं. 9425484452


हर सुबह सो रहे हैं, रतजगा हो रहा है,
ये कैसा चलन है, ये क्या हो रहा है।


गुनहगार बे खौफ, बेगुनाह फंस रहा है,
ऐसा इंसाफ अक्सर, ये क्या हो रहा है ।

खुद बखुद हुस्न बेहया ,बेपर्दा हो रहा है,
कैसा बेट़ब है फैशन, ये क्या हो रहा है।

दूध तक है नकली, असल सो रहा है,
सामान पैकेट में हो तो ,सब बिक रहा है।

तालीम की सज , गई हैं दुकानें
पिता मंहगी फीस का कर्ज ढ़ो रहा है ।
ये कैसा चलन है, ये क्या हो रहा है।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

मां ! क्षमा करो

मन मेरा मैला , फिर फिर हो जाता है
क्षमा शील हो तुम मां
मां ! क्षमा करो


मैं दुनियावी , फिर फिर अपराध किये जाता हूं
दया वान हो तुम मां
मां ! दया करो

व्रत, त्याग, तपस्या सधती न मुझे , फिर मंदिर आता हूं
बेटा तो तेरा ही हूं मां
मां कृपा करो



विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र. ४८२००८

मो. ००९४२५८०६२५२

देवी गीत

देवी गीत
प्रो सी बी श्रीवास्तव विदग्ध
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर ,जबलपुर म.प्र.



लगता अच्छा बहुत है यहां मां ! दूर दुनियां से मंदिर में आ के
करके दर्शन तुम्हारे , तुम्हें मां , अपने मन की व्यथा सब सुना के

शांति पाते हैं वे सब दुखी जन , जो भी आते शरण मां तुम्हारी
कही सुख शांति मिलती नही है, देख ली खूब दुनियां ये सारी
बेसहारों को और चाहिये क्या ? मां , तुम्हारी कृपा दृष्टि पा के


जहां तक यहां जाती निगाहें , दिखता रमणीक वातावरण है
बांटती मधुर आलोक सबको , कलश की ज्योति शुभ किरण है
सभी आनन्द भरपूर पाते , छबि तुम्हारी हृदय में बसा के


मन में श्रद्धा औ" आशा संजोये, जग से हारे या किस्मत के मारे
हाथ में लिये पूजा की थाली , आ के दरबार में मां तुम्हारे
तृप्ति पाते हैं जल धूप चंदन फूल फल दीप सब कुछ चढ़ा के

जगाते नये आभास पावन , पूजा व्रत सात्विकी भावनायें
मधुर विश्वास देती हैं मन को , समर्पण भाव की प्रार्थनायें
प्रेम पुलकित हो जाता हृदय है , माता अनुराग के गीत गा के

लगता अच्छा बहुत है यहां मां ! दूर दुनियां से मंदिर में आ के
करके दर्शन तुम्हारे , तुम्हें मां , अपने मन की व्यथा सब सुना के

शनिवार, 28 मार्च 2009

गोकुल तुम्हें बुला रहा हे कृष्ण कन्हैया ।

प्रो सी बी श्रीवास्तव
सी ६ विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर जबलपुर

गोकुल तुम्हें बुला रहा हे कृष्ण कन्हैया ।
वन वन भटक रही हैं ब्रजभूमि की गैया ।
दिन इतने बुरे आये कि चारा भी नही है
इनको भी तो देखो जरा हे धेनू चरैया ।।१।।

करती हे याद देवी माँ रोज तुम्हारी
यमुना का तट औ. गोपियाँ सारी ।
गई सुख धार यमुना कि उजडा है वृन्दावन
रोती तुम्हारी याद में नित यशोदा मैया ।।२।।

रहे गाँव वे , न लोग वे , न नेह भरे मन
बदले से है घर द्वार , सभी खेत , नदी , वन।
जहाँ दूध की नदियाँ थीं , वहाँ अब है वारूणी
देखो तो अपने देश को बंशी के बजैया ।।३।।

जनमन न रहा वैसा , न वैसा है आचरण
बदला सभी वातावरण , सारा रहन सहन ।
भारत तुम्हारे युग का न भारत है अब कहीं
हर ओर प्रदूषण की लहर आई कन्हैया ।।४।।

आकर के एक बार निहारो तो दशा को
बिगड़ी को बनाने की जरा नाथ दया हो ।
मन मे तो अभी भी तुम्हारे युग की ललक है
पर तेज विदेशी हवा मे बह रही नैया ।।५।।

आये हैं इस संसार में दिनचार के लिए

आये हैं इस संसार में दिनचार के लिए
प्रो सी बी श्रीवास्तव
सी ६ विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर जबलपुर

सब जी रहे हैं जिन्दगी पीरवार के लिए
पर मन में भारी प्यास लिए प्यार के लिए ।
सुख दिखता तो जरूर है पर िमलता नही है
शायद मिले जो हम जिये संसार के लिए।।1।।

हर दिन यहॉ हर एक की नई भाग दौड है
औरो से अधिक पाने की मन मे होड है।
सुख से सही उसका नही कोई है वास्ता
सारी यह आपाधापी है अधिकार के लिए।।2।।

अधिकार ने सबको सदा पर क्षोभ दिया है
जिसको मिला उसको यहॉ बेचैन किया है।
अिधेकार और धन से कभी भी भर न सका मन
रहा हट नई चाहत व्यापार के लिए ।।3।।

भरमाया सदा मोह ने माया ने फंसाया
खुद के सिवा कोई कभी कुछ काम न आया
रातें रही हों चॉदनी या घोर अंधरी
व्याकुल रहा है घर के ही विस्तार के लिए।।4।।

सचमुच यहॉ पर आदमी गुमराह बहुत है
कर पाता है थोडा सा ही करने को बहुत हैं ।
हम जो भी करे नाथ ! हमें इतना ध्यान हो
आये हैं इस संसार में दिन चार के लिए।।5।।

हमें दीजिए भगवान वह सामथ्र्य और ज्ञान
रहे शुध्द जिससे भावना साित्वक रहे विधान
कुछ ऐसा बने हमसे जो हो जग मे काम का