प्रार्थना
प्रो सी॑ बी श्रीवास्तव विदग्ध
C-6 , M.P.S.E.B. Colony Rampur ,
Jabalpur (M.P.) 482008
मोबा ०९४२५४८४४५२
हे दीनबन्धु दयालु प्रभु तुम विश्व के आधार हो
तुम बिन्दु में हो सिन्धु , अणु में अपरिमित विस्तार हो ।
तुम चेतना , आलोक , ऊर्जा , गति अलख पावन परम्
तम में फँसे , माया भ्रमित , अल्पज्ञ , सीमित नाथ हम ।
निर्बल , समय की धार में असहाय बहते जा रहे
तुम कर कृपा दे हाथ अपना नाथ हमें उबार लो ।।१।। हे दीन...
आनन्द , सत् चित् , शाँत , शुभ , सत्यं , शिवं , तुम सुन्दरम्
अपने बुने ही जाल में भूले , फँसे , उलझे हैं हम
सब चाहकर भी रात दिन भ़म से सुलझ पाते नही
इस आर्त मन की दुख भरी प्रभु प्रार्थना स्वीकार हो ।।२।। हे दीन...
मिलता नही सुख चैन मन को कहीं भी संसार में
तृष्णा का माया मृग लुभाता मन को हर व्यवहार में ।
नल से निकल जल सी बही सी जा रही है जिन्दगी
इसको सहेज , सँवारने को देव अपना प्यार दो।।३।। हे दीन...
शुक्रवार, 9 मई 2008
हम शब्दों के बुनकर हैं
हम शब्दों के बुनकर हैं
विवेक रंजन श्रीवास्तव
सी॑ - 6 एम.पी.ई.बी.कालोनी
रामपुर, जबलपुर ४८२००८
मोबा. ०९४२५४८४४५२
ई मेल vivekranjan.vinamra@gmail.com
देवी हो तुम अक्षर की माँ ,
हम शब्दों के बुनकर हैं !
भाव प्रसून गूँथ भाषा में ,
गीत लाये हम चुनकर हैं !!
भाव भंगिमा और तालियाँ,
दर्शक कवि के दर्पण हैं !
सृजन सफल जब हों आल्हादित
श्रोता रचना सुनकर हैं !!
हम पहचाने नीर क्षीर को ,
सबको इतनी बुद्धि दो !
विनत कामना करते हैं माँ ,
भाव शब्द से गुरुतर हो !!
बहुत प्रगति कर डाली हमने
आजादी के बरसों में !
और बढ़े आबादी पर माँ ,
धरती भी तो बृहतर हो !!
हम सब सीधे सादे वोटर ,
वो आश्वासन के बाजीगर !
पायें सब के सब मंत्रीपद,
पर कोई तो "वर्कर" हो !!
राग द्वेष छल बढ़ता जाता
धर्म दिखावा बनता जाता !
रथ पर चढ़ जो घूम रहे हैं ,
कोई तो पैगम्बर हो !!
घर में घुस आतंकी बैठे ,
खुद घर वाले सहमे सहमे !
चुन चुन कर के उनको मारे
ऐसा कोई रहबर हो !!
शिलान्यास तो बहुत हो रहे
प्रस्तर पट सब पड़े अधूरे ,
आवंटन को दिशा मिले अब
काम कोई तो जमकर हो!!
कागज कलम और कविता से
मन वीणा स्पंदित कर के !
युग की दिशा बदलकर रख दे
कवि ऐसा जादूगर हो !!
अँत करो माँ अंधकार का
जन गण के मन में प्रकाश दो !
नव युग के इस नव विहान में
बच्चा बच्चा "दिनकर" हो !!
विवेक रंजन श्रीवास्तव
विवेक रंजन श्रीवास्तव
सी॑ - 6 एम.पी.ई.बी.कालोनी
रामपुर, जबलपुर ४८२००८
मोबा. ०९४२५४८४४५२
ई मेल vivekranjan.vinamra@gmail.com
देवी हो तुम अक्षर की माँ ,
हम शब्दों के बुनकर हैं !
भाव प्रसून गूँथ भाषा में ,
गीत लाये हम चुनकर हैं !!
भाव भंगिमा और तालियाँ,
दर्शक कवि के दर्पण हैं !
सृजन सफल जब हों आल्हादित
श्रोता रचना सुनकर हैं !!
हम पहचाने नीर क्षीर को ,
सबको इतनी बुद्धि दो !
विनत कामना करते हैं माँ ,
भाव शब्द से गुरुतर हो !!
बहुत प्रगति कर डाली हमने
आजादी के बरसों में !
और बढ़े आबादी पर माँ ,
धरती भी तो बृहतर हो !!
हम सब सीधे सादे वोटर ,
वो आश्वासन के बाजीगर !
पायें सब के सब मंत्रीपद,
पर कोई तो "वर्कर" हो !!
राग द्वेष छल बढ़ता जाता
धर्म दिखावा बनता जाता !
रथ पर चढ़ जो घूम रहे हैं ,
कोई तो पैगम्बर हो !!
घर में घुस आतंकी बैठे ,
खुद घर वाले सहमे सहमे !
चुन चुन कर के उनको मारे
ऐसा कोई रहबर हो !!
शिलान्यास तो बहुत हो रहे
प्रस्तर पट सब पड़े अधूरे ,
आवंटन को दिशा मिले अब
काम कोई तो जमकर हो!!
कागज कलम और कविता से
मन वीणा स्पंदित कर के !
युग की दिशा बदलकर रख दे
कवि ऐसा जादूगर हो !!
अँत करो माँ अंधकार का
जन गण के मन में प्रकाश दो !
नव युग के इस नव विहान में
बच्चा बच्चा "दिनकर" हो !!
विवेक रंजन श्रीवास्तव
बुधवार, 5 मार्च 2008
गुरुवार, 3 जनवरी 2008
सिर्फ बातें व्यर्थ हैं कुछ काम होना चाहिये
सिर्फ बातें व्यर्थ हैं कुछ काम होना चाहिये
प्रो. सी.बी.श्रीवास्तव
सेवा निवृत प्राध्यापक
वर्तमान पता
c-6, mpseb colony, rampur Jabalpur ,पिन ४८२००८
फोन ०७६१ २७०२०८१
मोबा. ९४२५४८४४५२ email vivek1959@yahoo.co.in
सिर्फ बातें व्यर्थ हैं कुछ काम होना चाहिये
हर हृदय की शांति सुख आराम होना चाहिये
बातें तो होती बहुत पर काम हो पाते हैं कम
बातों में विश्वास कअ पेगअम होना चाहिये
उड़ती बातों औ॔ दिखावों से भला क्या फायदा
कअम हों जिनके सुखद परिणाम होनअ चाहिये
हवा के झोंकों से आके सोच यदि जावे बिखर
तो सजाने कअ उन्हें व्यायाम होना चाहिये
लोगों की नजरों में बसते स्वप्न हैं समृद्धि के
पाने नई उपलब्धि नित संग्राम होना चाहिये
पारदर्शी यत्न ऐसे हों जिन्हें सब देख लें
सफलता जो मिले उसका नाम होना चाहिये
सकारात्मक भावना भरती है हर मन में खुशी
सबके मन का आनन्द सुख का धाम होना चाहिये
आसुरी दुष्वृत्तियों के सामयिक उच्छेद को
साथ शाश्वत सजग तत्पर राम होना चाहिये !!
प्रो. सी.बी.श्रीवास्तव
सेवा निवृत प्राध्यापक
वर्तमान पता
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फोन ०७६१ २७०२०८१
मोबा. ९४२५४८४४५२ email vivek1959@yahoo.co.in
सिर्फ बातें व्यर्थ हैं कुछ काम होना चाहिये
हर हृदय की शांति सुख आराम होना चाहिये
बातें तो होती बहुत पर काम हो पाते हैं कम
बातों में विश्वास कअ पेगअम होना चाहिये
उड़ती बातों औ॔ दिखावों से भला क्या फायदा
कअम हों जिनके सुखद परिणाम होनअ चाहिये
हवा के झोंकों से आके सोच यदि जावे बिखर
तो सजाने कअ उन्हें व्यायाम होना चाहिये
लोगों की नजरों में बसते स्वप्न हैं समृद्धि के
पाने नई उपलब्धि नित संग्राम होना चाहिये
पारदर्शी यत्न ऐसे हों जिन्हें सब देख लें
सफलता जो मिले उसका नाम होना चाहिये
सकारात्मक भावना भरती है हर मन में खुशी
सबके मन का आनन्द सुख का धाम होना चाहिये
आसुरी दुष्वृत्तियों के सामयिक उच्छेद को
साथ शाश्वत सजग तत्पर राम होना चाहिये !!
रविवार, 11 नवंबर 2007
नीर नर्मदा का मधु हे
नीर नर्मदा का मधु है !
विवेक रंजन श्रीवास्तव
c-6 , M.P.S.E.B. Colony Rampur,
Jabalpur (M.P.) 482008
eks- 009425484452
ई मेल vivek1959@yahoo.co.in
नीर नर्मदा का मधु है !
साधू है हर पीने वाला !
आसक्त न हो भौतिकता का !
मैया तट पर रहने वाला !
मैया का गहना ये वन है !
वनवासी है जीवट वाला !
अपने में परिपूरित जीवन !
संतुष्ट सुखी और मतवाला !
आभूषण पाषाणों के माँ के!
कापू का कछार है फलवाला!
उन सबका जीवन धन्य हुआ!
जिनको गोदी माँ ने पाला !
डुबकी से इक संताप मुक्त हो !
पथिक क्लांत आने वाला !
कल कल बहता नीर निर्मला!
आतृप्त अँजुरी पीने वाला!
समरस सबको करती पोषित!
रेवा माँ ने सबको पाला!
मैया चरणों पर साथ झुकें !
राजा फकीर बालक बाला !
कण कण शंकर बन आप्लावित!
ऐसा मंदिर हैं माँ रेवा !
दर्शन भर से पायें सुदर्शन को !
अद्भुत अमृत जीवन रेखा !
विवेक रंजन श्रीवास्तव
c-6 , M.P.S.E.B. Colony Rampur,
Jabalpur (M.P.) 482008
eks- 009425484452
ई मेल vivek1959@yahoo.co.in
नीर नर्मदा का मधु है !
साधू है हर पीने वाला !
आसक्त न हो भौतिकता का !
मैया तट पर रहने वाला !
मैया का गहना ये वन है !
वनवासी है जीवट वाला !
अपने में परिपूरित जीवन !
संतुष्ट सुखी और मतवाला !
आभूषण पाषाणों के माँ के!
कापू का कछार है फलवाला!
उन सबका जीवन धन्य हुआ!
जिनको गोदी माँ ने पाला !
डुबकी से इक संताप मुक्त हो !
पथिक क्लांत आने वाला !
कल कल बहता नीर निर्मला!
आतृप्त अँजुरी पीने वाला!
समरस सबको करती पोषित!
रेवा माँ ने सबको पाला!
मैया चरणों पर साथ झुकें !
राजा फकीर बालक बाला !
कण कण शंकर बन आप्लावित!
ऐसा मंदिर हैं माँ रेवा !
दर्शन भर से पायें सुदर्शन को !
अद्भुत अमृत जीवन रेखा !
मंगलवार, 23 अक्टूबर 2007
झोपडी
झोपडी
विवेक रंजन श्रीवास्तव
c-6 , M.P.S.E.B. Colony Rampur ,
Jabalpur (M.P.) 482008
009425163952
ई मेल vivek1959@yahoo.co.in
झोपडी तुम इकाई हो
इमारतों की
तुम्हें नही मिटने देंगे
ये सरकारी दफ्तर
और उनमें काम करने वाले
तुम्हारी गिनती पर आधारित हैं
इनकी योजनायें
और उनका धन आबंटन
बरसात में बाढ़ आती है
तुम्हारी क्षति का आकलन होता है
सहायता राशि बंटती है
कुछ न कुछ इनके लिये भी बचती है
संवेदना के सर्वेक्षणों की
हवाई यात्रा
फोटो फ्रंट पेज पर छपती है
शीत लहर चलेगी
प्रकृति का नियम ही है
तुम्हारे आसपास
अलाव की माँग उठेगी
कोई समाज सेवी संस्था
तुम्हारे इलाके में कँबल बांटेगी
सरकारी अनुदान की आँच तापेगी
गर्मियों मे
आग लगने की
घटनायें भी होंगी ही
तब
घांस फूस बाँस के साथ
स्वाहा हो जायेंगे
तुम्हारे भीतर बुने गये
छोटे छोटे सपने
नेता जी बिना बुलाये आयेंगे
बहुत सी घोषणायें कर जायेंगे
झोपडी
तुम नेता जी का वोट बैंक हो
तुम्हें नही मिटने देंगी
उनकी आकांक्षायें
झोपडी
तुम्हारे चित्र कला है
तुम्हारी संस्कृति लोक जीवन है
तुम्हारी बेबसी
कथाकार का बिम्ब है
तुम्हारे अक्स में जिंदा है भारत
तुम्हें नहीं पता
तुम विकास के मैनेजमैंट का
कच्चा माल हो
और जनवादी चिंतन का आधार हो
जागो झोपडी
जागो
तुम्हारे हिस्से की नदी बही जा रही है
उसमें नहा रहे हैं
अफसरों के बंगले
और नेताओं की हवेलियां
क्रंदन कर रहा है तुम्हारे हिस्से का समुद्र
और झुका जा रहा है तुम्हारा आकाश
उठो जोपडी
पढ़ो विकास के पहाडे
तुम्हारी पूँजी है तुम्हारी सँख्या
तुम्हारी शक्ति है तुम्हारा श्रम
तुम्हें रिझाने चली आ रही हैं दुनियाँ
देखो छप्पर के सूराख से
सूरज झाँक रहा है
लेकर बेतहाशा सुरमई धूप
तुम्हारे हिस्से की
और घुसा आ रहा है
ताजी हवा का झोंका
तुम्हारा
पसीना पोंछने !
विवेक रंजन श्रीवास्तव
c-6 , M.P.S.E.B. Colony Rampur ,
Jabalpur (M.P.) 482008
009425163952
ई मेल vivek1959@yahoo.co.in
झोपडी तुम इकाई हो
इमारतों की
तुम्हें नही मिटने देंगे
ये सरकारी दफ्तर
और उनमें काम करने वाले
तुम्हारी गिनती पर आधारित हैं
इनकी योजनायें
और उनका धन आबंटन
बरसात में बाढ़ आती है
तुम्हारी क्षति का आकलन होता है
सहायता राशि बंटती है
कुछ न कुछ इनके लिये भी बचती है
संवेदना के सर्वेक्षणों की
हवाई यात्रा
फोटो फ्रंट पेज पर छपती है
शीत लहर चलेगी
प्रकृति का नियम ही है
तुम्हारे आसपास
अलाव की माँग उठेगी
कोई समाज सेवी संस्था
तुम्हारे इलाके में कँबल बांटेगी
सरकारी अनुदान की आँच तापेगी
गर्मियों मे
आग लगने की
घटनायें भी होंगी ही
तब
घांस फूस बाँस के साथ
स्वाहा हो जायेंगे
तुम्हारे भीतर बुने गये
छोटे छोटे सपने
नेता जी बिना बुलाये आयेंगे
बहुत सी घोषणायें कर जायेंगे
झोपडी
तुम नेता जी का वोट बैंक हो
तुम्हें नही मिटने देंगी
उनकी आकांक्षायें
झोपडी
तुम्हारे चित्र कला है
तुम्हारी संस्कृति लोक जीवन है
तुम्हारी बेबसी
कथाकार का बिम्ब है
तुम्हारे अक्स में जिंदा है भारत
तुम्हें नहीं पता
तुम विकास के मैनेजमैंट का
कच्चा माल हो
और जनवादी चिंतन का आधार हो
जागो झोपडी
जागो
तुम्हारे हिस्से की नदी बही जा रही है
उसमें नहा रहे हैं
अफसरों के बंगले
और नेताओं की हवेलियां
क्रंदन कर रहा है तुम्हारे हिस्से का समुद्र
और झुका जा रहा है तुम्हारा आकाश
उठो जोपडी
पढ़ो विकास के पहाडे
तुम्हारी पूँजी है तुम्हारी सँख्या
तुम्हारी शक्ति है तुम्हारा श्रम
तुम्हें रिझाने चली आ रही हैं दुनियाँ
देखो छप्पर के सूराख से
सूरज झाँक रहा है
लेकर बेतहाशा सुरमई धूप
तुम्हारे हिस्से की
और घुसा आ रहा है
ताजी हवा का झोंका
तुम्हारा
पसीना पोंछने !
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