शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

आप विषय दीजीये मैं लिखूंगा कविता ...कल ही पढ़ियेगा उसे और बताइयेगा केसी लगी ..

आप विषय दीजीये मैं लिखूंगा कविता ...
समस्या पूर्ती हमारी पुरानी विधा है ...
इस ब्लाग को आपके लिये और भी पठनीय बनाने हेतु मेरा आग्रह है कि आप विषय दीजीये मैं लिखूंगा कविता ...
.

शनिवार, 25 सितंबर 2010

हमारे मंदिर और मस्जिद को देने के लिये फूल , सुगंध और साया

रोपना है मीठी नीम अब हमें

कभी देखा है आपने किसी पेड़ को मरते हुये ?
देखा तो होगा शायद
पेड़ की हत्या , पेड़ कटते हुये


हमारी पीढ़ी ने देखा है एक
पुराने , कसैले हो चले
किंवाच और बबूल में तब्दील होते
कड़वे बहुत कड़वे नीम के ठूंठ को
ढ़हते हुये



हमारे मंदिर और मस्जिद
को देने के लिये
फूल , सुगंध और साया
रोपना है आज हमें
एक हरा पौधा
जो एक साथ ही हो
मीठी नीम , सुगंधित गुलाब और बरगद सा

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

बरसात की बात

बरसात की बात


विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर , जबलपुर


लो हम फिर आ गये
बरसात की बात करने ,पावस गोष्ठी में
जैसे किसी महिला पत्रिका का
वर्षा विशेषांक हों , बुक स्टाल पर
ये और बात है कि
बरसात सी बरसात ही नही आई है
अब तक
बादल बरसे तो हैं , पर वैसे ही
जैसे बिजली आती है गांवो में
जब तब

हर बार
जब जब
घटायें छाती है
मेरा बेटा खुशियां मनाता है
मेरा अंतस भी भीग जाता है
और मेरा मन होता है एक नया गीत लिखने का
मौसम के इस बदलते मिजाज से
हमारी बरसात से जुड़ी खुशियां बहुगुणित हो
किश्त दर किश्त मिल रही हैं हमें
क्योकि बरसात वैसे ही बार बार प्रारंभ होने को ही हो रही है
जैसे हमें एरियर
मिल रहा है ६० किश्तों में

मुझे लगता है
अब किसान भी
नही करते
बरसात का इंतजार उस व्यग्र तन्मयता से
क्योंकि अब वे सींचतें है खेत , पंप से
और बढ़ा लेते हैं लौकी
आक्सीटोन के इंजेक्शन से

देश हमारा बहुत विशाल है
कहीं बाढ़ ,तो कहीं बरसात बिन
हाल बेहाल हैं
जो भी हो
पर
अब भी
पहली बरसात से
भीगी मिट्टी की सोंधी गंध,
प्रेमी मन में बरसात से उमड़ा हुलास
और झरनो का कलकल नाद
उतना ही प्राकृतिक और शाश्वत है
जितना कालिदास के मेघदूत की रचना के समय था
और इसलिये तय है कि अगले बरस फिर
होगी पावस गोष्ठी
और हम फिर बैठेंगे
इसी तरह
नई रचनाओ के साथ .

गुरुवार, 4 मार्च 2010

बच्चो के सपनो में,परियों की दुआ दीजिये

बच्चो के सपनो में,परियों की दुआ दीजिये

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर
जबलपुर

बच्चो के सपनो में,परियों की दुआ दीजिये
नींद चैन की मेरे बच्चों की लौटा दीजिये

प्यार का पाठ पढ़ना , यदि अपराध हो
तो सबसे पहले हमको ही सजा दीजिये
नहा आये हैं ,पहने हैं कपड़े झक सफेद
गुलाल प्यार का थोड़ा सा लगा दीजिए

रोशनी की किरण खुद ही चली आयेगी
छेद छोटा सा छत में , बस करा दीजिये
फैला रहा है मुस्कराकर, खुश्बू हवाओ में
इस फूल के पौधे चार, और लगा दीजिये

न बनें नक्सलवादी , न कोई आत्मघाती
इंसानी नस्ल में ,आदमी ही रहने दीजिये

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

हर सुबह सो रहे हैं, रतजगा हो रहा है,

हर सुबह सो रहे हैं, रतजगा हो रहा है,

विवेकरंजन श्रीवास्तव

मो.नं. 9425484452


हर सुबह सो रहे हैं, रतजगा हो रहा है,
ये कैसा चलन है, ये क्या हो रहा है।


गुनहगार बे खौफ, बेगुनाह फंस रहा है,
ऐसा इंसाफ अक्सर, ये क्या हो रहा है ।

खुद बखुद हुस्न बेहया ,बेपर्दा हो रहा है,
कैसा बेट़ब है फैशन, ये क्या हो रहा है।

दूध तक है नकली, असल सो रहा है,
सामान पैकेट में हो तो ,सब बिक रहा है।

तालीम की सज , गई हैं दुकानें
पिता मंहगी फीस का कर्ज ढ़ो रहा है ।
ये कैसा चलन है, ये क्या हो रहा है।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

मां ! क्षमा करो

मन मेरा मैला , फिर फिर हो जाता है
क्षमा शील हो तुम मां
मां ! क्षमा करो


मैं दुनियावी , फिर फिर अपराध किये जाता हूं
दया वान हो तुम मां
मां ! दया करो

व्रत, त्याग, तपस्या सधती न मुझे , फिर मंदिर आता हूं
बेटा तो तेरा ही हूं मां
मां कृपा करो



विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र. ४८२००८

मो. ००९४२५८०६२५२

देवी गीत

देवी गीत
प्रो सी बी श्रीवास्तव विदग्ध
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर ,जबलपुर म.प्र.



लगता अच्छा बहुत है यहां मां ! दूर दुनियां से मंदिर में आ के
करके दर्शन तुम्हारे , तुम्हें मां , अपने मन की व्यथा सब सुना के

शांति पाते हैं वे सब दुखी जन , जो भी आते शरण मां तुम्हारी
कही सुख शांति मिलती नही है, देख ली खूब दुनियां ये सारी
बेसहारों को और चाहिये क्या ? मां , तुम्हारी कृपा दृष्टि पा के


जहां तक यहां जाती निगाहें , दिखता रमणीक वातावरण है
बांटती मधुर आलोक सबको , कलश की ज्योति शुभ किरण है
सभी आनन्द भरपूर पाते , छबि तुम्हारी हृदय में बसा के


मन में श्रद्धा औ" आशा संजोये, जग से हारे या किस्मत के मारे
हाथ में लिये पूजा की थाली , आ के दरबार में मां तुम्हारे
तृप्ति पाते हैं जल धूप चंदन फूल फल दीप सब कुछ चढ़ा के

जगाते नये आभास पावन , पूजा व्रत सात्विकी भावनायें
मधुर विश्वास देती हैं मन को , समर्पण भाव की प्रार्थनायें
प्रेम पुलकित हो जाता हृदय है , माता अनुराग के गीत गा के

लगता अच्छा बहुत है यहां मां ! दूर दुनियां से मंदिर में आ के
करके दर्शन तुम्हारे , तुम्हें मां , अपने मन की व्यथा सब सुना के